J. Krishnamurti's Teachings Online in Indian Languages (Hindi, Punjabi, Gujarati, Marathi, Bengali etc.)







तो हमें करना क्या होगा?


मेरे विचार में कर्म की समस्या से हमारा गहरा सरोकार आवश्यक है | जब इतनी सारी समस्याएं हमारे सामने हैं--गरीबी, अधिक जनसंख्या, यंत्रों का असाधारण विकास, औद्योगीकरण, आतंरिक तथा बाह्य रूप से गिरावट का एहसास--तो हमें करना क्या होगा?

Read more >>

Understanding Our Mind


It seems to me that without understanding the way our minds work, one cannot understand and resolve the very complex problems of living. This understanding cannot come through book knowledge.

अपने मन को समझना


मुझे ऐसा लगता है कि अपने मन के तौर-तरीकों को समझे बिना यह संभव नहीं है कि जीवन की अति जटिल समस्याओं को समझा और सुलझाया जा सके | इस प्रकार की समझ किताबी ज्ञान से नहीं आ सकती |

Read more >>

How do you know that what you are saying is true?


Reply: Why do you ask me that question? Isn’t it true that as long as there is national division, economic division, racial division, religious division, there must be conflict. That is a fact. Right? Would you accept that?

पहला प्रश्न है आपको कैसे मालूम है कि जो आप कह रहे हैं वह सच है?


आप मुझसे यह सवाल क्यों कर रहे हैं? क्या यह सच नहीं है कि जब तक राष्ट्रीय, आर्थिक, प्रजातीय और धार्मिक विभाजन है, द्वंद्व का होना तय है | यह एक तथ्य है | ठीक? क्या आप इससे सहमत हैं?

Read more >>    top of page ↑

Question: Why do we hate the poor?


Krishnamurti: Do you hate the poor? Do you hate the poor woman who is carrying the heavy basket on her head, walking all the way from Saraimohana to Banaras? Do you hate her with her torn clothes, dirty?

प्रश्न : हम गरीबों से घृणा क्यों करते हैं?


कृष्णमूर्ति : क्या आप गरीबों से घृणा करते हैं? सराय-मोहाना से बनारस के पूरे रास्ते भर सर पर भरी टोकरी ढोकर ले जाती हुई उस गरीब स्त्री से आप घृणा करते हैं? क्या आप उससे और उसके फटे-पुराने मैले वस्त्रों से, गरीबों से घृणा करते हैं?

Read more >>    top of page ↑

The Implication of Sorrow


I think we ought to talk over together, going into it rather deeply, the implication of sorrow, so as to find out for ourselves whether sorrow and love can exist together. And also what is our relationship to the sorrow of mankind? - not only to our own personal daily grief, hurt, pain, and the sorrow that comes with death.

दुख के अभिप्राय


मुझे लगता है कि हम सब साथ मिलकर दुख के अभिप्राय पर, इसके निहिताथों पर चर्चा करें, इसमें गहराई से पैठें ताकि हम स्वयं पता लगा सकें कि क्या दुख और प्रेम एक साथ रह सकते हैं | और इस बात का भी पता लगाएं कि मनुष्य जाति के दुख के साथ हमारा क्या रिश्ता है? -- केवल हमारे अपने दिन-प्रतिदिन के निजी शोक, पीड़ा तथा मृत्यु से जुड़े दुख के साथ ही नहीं |

Read more >>    top of page ↑