J. Krishnamurti's Teachings Online in Indian Languages (Hindi, Punjabi, Gujarati, Marathi, Bengali etc.)







हिंसा के माहौल में हमारी ज़िम्मेदारी

कृष्णमूर्ति अध्ययन शिविर : 1 - 4 दिसम्बर 2016 कृष्णमूर्ति स्टडी सेंटर, वाराणसी
‘‘क्या आप हिंसा के चेहरे को साफ और स्पष्ट रूप से देख सकते हैं - हिंसा का चेहरा जो न केवल आपके बाहर बल्कि भीतर भी है ? जिसका अर्थ होगा कि आप पूरी तरह से हिंसा से मुक्त हैं क्योंकि आपने किसी विचारधारा को नहीं थाम रखा है, जिसके जरिये आपको हिंसा से छुटकारा मिलने जा रहा है। इसके लिए बहुत गहरे ध्यान की आवश्यकता है, न कि आपकी शाब्दिक सहमति या असहमति मात्र की।’’ - जे. कृष्णमूर्ति, ज्ञात से मुक्ति


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Question: How can we create a happy world when there is suffering?


Krishnamurti: You did not listen to what was being said. You were occupied with your question. While I was talking, your mind was wondering how you were going to ask your question, how you were going to put it into words, so your mind was occupied with what you were going to ask, and you did not really listen.

प्रश्न : जब तक चारों ओर इतना दुःख है तब तक हम सुखी संसार कैसे बना सकते हैं?


कृष्णमूर्ति : जो कुछ अभी कहा जा रहा था उसे आपने ध्यान से सुना नहीं | आप अपने ही प्रश्न में उलझे रहे | जिस समय मैं बोल रहा था आपका मन इस उधेड़-बुन में खोया था कि अपना प्रश्न किस प्रकार से पूछा जाए |

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Is it right


Question: Is it right that fame comes after death?
Krishnamurti: Do you think that the villager who dies will have fame afterwards?


क्या यह सही है


प्रश्न : क्या यह सही है कि मनुष्य के मरने के पश्चात ही उसका यश फैलता है?
कृष्णमूर्ति : क्या आपको लगता है कि एक ग्रामीण कि मृत्यु के उपरांत उसका यश फैलता है?

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What Is the Purpose of Life?


The significance of life is living. Do we really live, is life worth living when there is fear, when our whole life Is trained in imitation, in copying? In following authority is there living? Are you living when you follow somebody, even if he is the greatest saint or the greatest politician or the greatest scholar?

जीवन का प्रयोजन क्या है?


जीवन की सार्थकता जीने में है | जब हम भयग्रस्त रहते हैं, जब हमारा सारा जीवन अनुकरण करने के लिए नक़ल करते रहने के लिए ढाल दिया गया हो तब हम क्या वास्तव में जी रहे होते हैं, तब क्या वह जीवन जीने योग्य रहता है? किसी प्रामाण्य रूप में स्थापित व्यक्ति का अनुगमन करते जाना क्या जीवन जीना है? जब हम किसी के पिछलग्गू बने हुए हों, चाहे वह बड़े से बड़ा संत हो, राजनेता हो या विद्वान हो, तब क्या हम जी रहे होते हैं?

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