Excerpts On God / First and Last Freedom


First and Last Freedom   Read | Download

यह एक प्रत्यक्ष तथ्य है


यह एक प्रत्यक्ष तथ्य है कि मानव को उपासना करने के लिए कुछ न कुछ चाहिए | आप और मैं और अन्य अनेक लोग अपने जीवन में कुछ पवित्र, कुछ पावन उपलब्ध कर लेना चाहते है, और हम या तो मंदिरों, मस्जिदों और गिरजों में जाते हैं, अथवा हमारे पास अन्य प्रतीक, प्रतिमाएं अथवा अवधारणाएं होती हैं, जिनकी हम उपासना किया करते हैं

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मन का कार्य विचार करना है |


प्रश्न: मन का कार्य विचार करना है | मैंने कई वर्ष उन चीज़ों के बारे में सोचते हुए बिताए हैं जिन्हें हम सब जानते हैं – व्यापार, विज्ञान, दर्शन, मनोविज्ञान, कलाएं आदि – तथा अब मैं ईश्वर के बारे में काफी कुछ विचार करता हूं | अनेक रहस्यदर्शियों तथा धार्मिक ग्रंथकारों द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों का अध्ययन करने से मैं कायल हो गया हूं कि ईश्वर है, तथा मैं इस विषय में अपने विचारों का योगदान दे सकता हूं | इसमें गलत क्या है? क्या ईश्वर के बारे में विचार करने से ईश्वर के साक्षात्कार में सहायता नहीं मिलती है?

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धर्म की सार्थकता के प्रश्न पर मैं बात करना चाहूँगा


धर्म की सार्थकता के प्रश्न पर मैं बात करना चाहूँगा, ताकि हम सिर्फ इसकी शाब्दिक व्याख्या तक सीमित न रह कर इसे गेहनत से समझ सकें | परंतु इससे पहले कि हम इस प्रश्न में गहराई से उतरें, हमें इस बारे में एकदम स्पष्ट होना होगा कि धार्मिक मन क्या है तथा मन की वह क्या अवस्था है, जो यथार्थपरक ढंग से धर्म के संपूर्ण प्रश्न की जांच-पड़ताल करती है ।

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यह महत्त्वपूर्ण है


देखिए, जैसा कि मैंने उस दिन कहा था, वक्ता महत्वपूर्ण नहीं है, पर वह क्या कहता है, यह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह जो कुछ कह रहा है, वह आपके ही आत्म-वार्तालाप का उच्चस्वर है | वक्ता जिन शब्दों का प्रयोग कर रहा है, उनके द्वारा आप अपने आप को ही सुन रहे हैं, न कि वक्ता को, और इसीलिए सुनना अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है |

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सर, आप वैज्ञानिक हैं


कृष्णमूर्ति : सर, आप वैज्ञानिक हैं, आपने परमाणु इत्यादि का निरीक्षण किया है | इस सारे निरीक्षण के उपरांत क्या आप यह महसूस नहीं करते कि इस सबके परे बहुत कुछ और भी है?
डेविड बोम : हमेशा यह महसूस होता है कि इसके पार कुछ और है, पर इससे यह पता नहीं चलता कि यह क्या है? यह तो सपष्ट है ही कि जो कुछ भी मनुष्य जानता है, सीमित है।
कृष्णमूर्ति : हां।

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इस सबको सूत्रों और शब्दों में व्यक्त करना कितना व्यर्थ जान पड़ता है;


इस सबको सूत्रों और शब्दों में व्यक्त करना कितना व्यर्थ जान पड़ता है; चाहे जितने सही शब्द प्रयोग क्यों न किए गये हों, वर्णन कितना भी अधिक सुस्पष्ट क्यों न हो, इस सबके माध्यम से वास्तविक तथ्य संप्रेषित नहीं हो पाता |

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प्राक्कथन


प्राक्कथन

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