Network Of Thought



The Implication of Sorrow


I think we ought to talk over together, going into it rather deeply, the implication of sorrow, so as to find out for ourselves whether sorrow and love can exist together. And also what is our relationship to the sorrow of mankind? - not only to our own personal daily grief, hurt, pain, and the sorrow that comes with death.

दुख के अभिप्राय


मुझे लगता है कि हम सब साथ मिलकर दुख के अभिप्राय पर, इसके निहिताथों पर चर्चा करें, इसमें गहराई से पैठें ताकि हम स्वयं पता लगा सकें कि क्या दुख और प्रेम एक साथ रह सकते हैं | और इस बात का भी पता लगाएं कि मनुष्य जाति के दुख के साथ हमारा क्या रिश्ता है? -- केवल हमारे अपने दिन-प्रतिदिन के निजी शोक, पीड़ा तथा मृत्यु से जुड़े दुख के साथ ही नहीं |

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Religion


We have talked about the complex problem of existence, about the forming of images in our relationships with each other and the images which thought projects and which we worship. We have talked about fear, pleasure and the ending of sorrow and the question of what love is, apart from all the travail that is involved in so-called love. We have talked about compassion with its intelligence and about death. We ought now to talk about religion.

धर्म


अस्तित्व की जटिल समस्या के बारे में हमने बात की, अपने आपसी रिश्तों में छवियों के निर्माण को लेकर चर्चा की और इस बारे में भी बात की कि कैसे विचार इन्हें प्रक्षेपित किया करता है और हम इन प्रतिमाओं को, इन छवियों को पूजा करते हैं | हमने चर्चा की भय के, सुख के बारे में, दुख के अंत के विषय में और इस प्रश्न को लेकर भी कि प्रेम क्या है | उस तमाम दुख-दर्द के अलावा जो तथाकथित प्रेम में देखने को मिलता है | हमने करुणा की तथा उसके साथ आने वाली प्रज्ञा की और मृत्यु के विषय में भी बात की | अब धर्म के बारे में विचार-विमर्श करना हमारे लिए उचित होगा |

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We do not belong to that crowd at all.


Most unfortunately there are only two talks and so it is necessary to condense what we have to say about the whole of existence. We are not doing any kind of propaganda; we are not persuading you to think in one particular direction, nor convince you about anything - we must
be quite sure of that. We are not bringing something exotic from the East like the nonsense that goes on in the name of the gurus and those people who write strange things after visiting India - we do not belong to that crowd at all.

हम उस भीड़ में हरगिज़ शामिल नहीं हैं |


बदकिस्मती से हमारे पास केवल दो वार्ताओं का ही समय है; इसलिए सारे अस्तित्व के बारे में हमें जो कुछ कहना है उसे अब संक्षेप में ही कहना होगा | हम किसी प्रकार का प्रचार नहीं कर रहे हैं, किसी विशिष्ट दिशा में सोचने के लिए हम आपको प्रेरित नहीं करना चाहते, न ही किसी बारे में आपसे कुछ मनवाना चाहते हैं -- इस मामले में हमें बिलकुल आश्वस्त रहना चाहिए | हम पूरब से कोई परदेसी लुभावनी चीज़ लेकर नहीं आए हैं -- जैसे कि गुरुओं को लेकर ऊटपटांग बातें की जाती हैं या जैसे कि भारत-यात्रा करने के बाद अजीबोगरीब, अनाप-शनाप बातें लिख दी जाती हैं -- हम उस भीड़ में हरगिज़ शामिल नहीं हैं |

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To live our daily life without a single problem.


We are like two friends sitting in the park on a lovely day talking about life, talking about our problems, investigating the very nature of our existence, and asking ourselves seriously why life has become such a great problem, why, though intellectually we are very sophisticated, yet our daily life is such a grind, without any meaning, except survival - which again is rather doubtful. Why has life, everyday existence, become such a torture? We may go to church, follow some leader, political or religious, but the daily life is always a turmoil, though there are certain periods which are occasionally joyful, happy, there is always a cloud of darkness about our life. And these two friends, as we are, you and the speaker, are
talking over together in a friendly manner, Perhaps with affection, with care, with concern, whether it is at all possible to live our daily life without a single problem.

दैनिक जीवन बिना किसी भी समस्या के जीना संभव हैं |


हम एक सुहावने दिन किसी उद्यान में बैठे हुए दो मित्रों कि तरह हैं -- जीवन के बारे में अपनी समस्यों के बारे में बातचीत करते हुए, अपने अस्तित्व की प्रकृति का अन्वेषण करते हुए, और बड़ी गंभीरता से अपने-आप से पूछते हुए कि जीवन ऐसी गंभीर समस्या क्यों बन गया है, बौद्धिक रूप से हमारे बहुत परिष्कृत होने के बावजूद हमारा दैनिक जीवन एक चक्की जैसा क्यों बन गया है, बिना किसी अर्थ के बस जिंदा रहें सिर्फ इसलिए -- और उसका भी भला क्या भरोसा | यह जीवन, हमारा दैनंदिन अस्तित्व इस कदर यातनामय क्यों हों गया है ? हम भले ही चर्च में जाएं, किसी राजनीतिक या धार्मिक नेता का अनुसरण करें, पर हमारा दैनिक जीवन हमेशा विक्षुब्ध ही रहता है; और संजोग से खुशी के, आनंद के कुछ अवसर नसीब भी हो जाते हैं, तो भी सियाही का एक बादल हमारे जीवन पर मंडराता ही रहता है | और ये दो मित्र -- आप और मैं -- मैत्रीपूर्ण ढंग से विचार-विमर्श कर रहे हैं, शायद बड़े स्नेह से बिना किसी हडबड़ी के, इस सरोकार के साथ कि क्या अपना दैनिक जीवन बिना किसी भी समस्या के जीना संभव हैं भी?

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