J. Krishnamurti's Teachings Online in Indian Languages (Hindi, Punjabi, Gujarati, Marathi, Bengali etc.)







Question: Why do we fight in this world?


Krishnamurti: Why do we fight? You want something and I want the same thing, so we fight for it. You are clever, I am not clever, and we fight about it.

प्रश्न : इस संसार में हम आपस में लड़ते-झगड़ते क्यों हैं?


कृष्णमूर्ति : हम लड़ते-झगड़ते क्यों हैं | आप किसी चीज़ को पाना चाहते हैं और मैं भी उसे पाना चाहता हूं इसलिए उसे पाने के लिए हम एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते हैं | आप होशियार हैं, मैं होशियार नहीं हूं और इस पर हम झगड़ते हैं |

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Order


Order is necessary in our everyday activity; order in our action and order in our relationship with each other. One has to understand that the very quality of order is totally different from that of discipline. Order comes through directly learning about ourselves - not according to some philosopher or some psychologist. We discover order for ourselves when we are free from all sense of compulsion, from all sense of determined effort to obtain order along a particular path. That order comes very naturally. In that order there is righteousness.

व्यवस्था


हमारे प्रतिदिन के क्रियाकलाप में व्यवस्था का होना अत्यावश्यक है | साथ ही साथ हमारे एक दुसरे के प्रति संबंध में भी व्यवस्था होनी चाहिए | यह समझना ज़रुरी है कि व्यवस्था का गुणधर्म ही अनुशासन के निहितार्थ से एकदम अलग होता है | व्यवस्था आती है अपने बारे में प्रत्यक्ष रूप से सीखने के परिणामस्वरूप-- किसी दार्शनिक या किसी मनोवैज्ञानिक के अनुसार सीखने से नहीं | दबाव के किसी भी भाव से जब हम मुक्त होते हैं, किसी विशिष्ट मार्ग से व्यवस्था उपलब्ध करने के दृढ़ प्रयास के भाव से मुक्त होते हैं, तब हमें अपने आप व्यवस्था का पता चल जाता है | वह व्यवस्था स्वतः ही, सहज ही आ जाती है | उसी व्यवस्था में सही होना संभव होता है |

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यह सीधी सी बात है |


जब मैं अपने आप को एक हिंदू, एक ईसाई, एक बौद्ध कहता हूँ – जो कि पूरी की पूरी परंपरा है, परंपरा का बोझ, ज्ञान का बोझ, सरकारों का बोझ है – तो मैं कुछ देख नहीं सकता हूँ, मैं स्पष्ट और सही तरीके से अवलोकन नहीं कर सकता हूँ | इस प्रकार के मन से मैं जीवन को मात्र एक ईसाई, एक बौद्ध, एक हिंदू, एक राष्ट्रवादी, एक साम्यवादी, अथवा किसी अन्य वाद के अनुगामी की दृष्टि से ही देख पाता हूँ, तथा उस तरह की दृष्टि मुझे अवलोकन करने से रोकती है | यह सीधी सी बात है |

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Fear Prevents Psychological Freedom


So our first problem, our really essential problem, is to be free from fear. You know what fear does? It darkens the mind. It makes the mind dull. From fear there is violence. From fear there is worship of something.

भय मानसिक स्वतंत्रता में बाधक होता है


अतः हमारी प्राथमिक समस्या, हमारी वास्तविक और अपरिहार्य समस्या है भय से मुक्त होना | क्या आप जानते है की भय करता क्या है? यह मन को अंधकारमय कर देता है, उसे कुंद कर देता है | भय से हिंसा उपजती है | किसी की पूजा भय के कारन ही की जाती है |

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व्यक्ति का सर्वोच्च महत्व है


व्यक्ति का सर्वोच्च महत्व है, भले ही समाज, धर्म और सरकार इस तथ्य को मान्यता नहीं देते | आप अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आप यथार्थ की विस्फोटक सर्जनात्मकता को लाने वाले एकमात्र साधन हैं | आप स्वयं ही वह वातावरण हैं जिसमें यथार्थ अस्तित्व में आ सकता है | लेकिन आप देख चुके हैं कि सभी सरकारें, सभी संगठित धर्म और समाज व्यक्ति के महत्व पर ज़ोर देते हुए भी व्यक्ति के मर्म, व्यक्ति की भावनाओं को मिटाने की कोशिश करते हैं, क्योंकि वे सामूहिक भावदशा, सामूहिक प्रतिक्रिया चाहते हैं |

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