Excerpts in General



Self-Ending, Not Self-Improvement, Ends Suffering


One of the most difficult things to understand, it seems to me, is this problem of change. We see that there is progress in different forms, so-called evolution, but is there a funda mental change in progress? I do not know if this problem has struck you at all, or whether you have ever thought about it, but perhaps it will be worthwhile to go into the question this morning.

आत्म विकास नहीं अहं का अवसान दुःख का अंत करता है


मुझे लगता है की परिवर्तन की समस्या को समझना अत्यंत कठिन हैं | हम देखते है की चारों ओर नाना प्रकार की प्रगति हो रही है -- तथाकथित विकास हो रहा है, परंतु क्या इस प्रगति से मूलभूत परिवर्तन हो पा रहा है? मैं नहीं जानता की आपका ध्यान कभी इस समस्या पर गया है या नहीं, या अपने कभी इस विषय पर सोचा है या नहीं | आज सुबह इस प्रश्न पर विचार करना शायद उपयुक्त रहेगा |

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Is Loneliness the Same as Aloneness?


We know loneliness, don't we, the fear, the misery, the antagonism, the real fright of a mind that is aware of its own loneliness. We all know that. Don't we? That state of loneliness is not foreign to any one of us. You may have all the riches, all the pleasures, you may have great capacity and bliss, but within, there is always the lurking shadow of loneliness.

अकेलापन और एकाकीपन क्या एक ही चीज़ है?


हम अकेलेपन से परिचित हैं, हैं न? हम उस मन की घबराहट, क्लेश, वैरभाव और अपने अकेलेपन के एहसास से उपजी भयातुरता के असली रूप से परिचित हैं | हमारे लिए यह नयी बात नहीं है? अकेलेपन की यह अवस्था हमारे लिए अनजानी नहीं है| आपके पास विपुल समृद्धि हो, सारी सुख-सुविधाएं हों, अत्यधिक क्षमता और आनंद हों, परंतु फिर भी आपके मन में अकेलेपन का साया सदैव डोलता रहता है |

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Desire and Longing


For most of us, desire is quite a problem—the desire for property; for position, for power, for comfort, for immortality, for continuity, the desire to be loved, to have something permanent, satisfying, lasting, something which is beyond time. Now, what is desire?

इच्छा और लालसा


अधिकांशतः हमारे लिए इच्छा एक समस्या ही है -- धन-संपदा की इच्छा, प्रतिष्ठा की, शक्ति की, ऐशो-आराम की, अमरता की, निरंतरता की इच्छा, प्रेम पाने की इच्छा, किसी ऐसी चीज़ की इच्छा जो स्थायी हो, त्रुप्तिदायी हो, कालजयी हो, कुछ ऐसी चीज़ जो कल से परे हो | तो इच्छा क्या है?

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To Think We Own a Human Being Makes Us Feel Important


Jealousy is one of the ways of holding the man or the woman, is it not? The more we are jealous, the greater the feeling of possession. To possess something makes us happy; to call something, even a dog, exclusively our own makes us feel warm and comfortable. To be exclusive in our possession gives us assurance and certainty to ourselves. To own something makes us important; it is this importance we cling to.

यह सोचना की मैं किसी का स्वामी हूँ, हमें महत्त्वपूर्ण होने का एहसास देता है


ईर्ष्या किसी पुरुष या किसी स्त्री को अपने स्वामित्व में बनाये रखने का एक ढंग है | हम जितने अधिक ईर्ष्यालु होंगे, हमारा स्वामित्वभाव उतना ही प्रबल होगा | अपने स्वामित्व में किसी को रखने से हमें ख़ुशी मिलती है, किसी पर, यहाँ तक की कुत्ते पर भी, अपना एकाधिकार जताना हमें भला और सुखद लगता है | उस पर अपना एकमेव स्वामित्व हमें सुनिश्चितता और आत्मविश्वास से भर देता है | किसी का स्वामी होना हमें महत्त्वपूर्ण बना देता है और यह महत्वपूर्ण होना ही है जिससे हम चिपके रहते है |

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Self-Pity Is a Factor of Sorrow


Self-pity is when you complain about yourself unconsciously or consciously, when you are pitying yourself, when you say, "I can't do anything against the environment in which I am, placed as I am;" when you call yourself a pest, bemoaning your own lot. And so there is sorrow.

अपने आप पर तरस खाना दुःख का कारक होता है


अपने आप पर तरस तब आता है जब चेतन या अचेतन रूप से आप अपने आप से खुद के बारे में ही शिकायत कर रहे होते है, जब आपको स्वयं पर दया आ रही होती है, जब आप कह उठते है, "जिन परिस्थितियों में, जिस स्थिति में मैं रह रहा हूँ उसके विरुद्ध में कुछ भी नहीं कर सकता |" जब आप स्वयं को एक कीड़ा मान रहे होते है; अपने भाग्य को कोस रहे होते है -- इस प्रकार प्रवेश कर लेता है दुःख |

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